उत्तराखंड में वन भूमि पर कब्जे के मामलों को लेकर बढ़ते विवाद के बीच नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर प्रदेश भर के हजारों परिवारों के हित में विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। पत्र में ऋषिकेश के पशुलोक क्षेत्र की 2866 एकड़ वन भूमि के मामले का जिक्र करते हुए कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट के 22 दिसंबर 2025 के कड़े निर्देशों से क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई है और हजारों परिवारों में बेचैनी फैल गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए उत्तराखंड सरकार को फटकार लगाई थी कि वह वन भूमि पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण को चुपचाप देखती रही। कोर्ट ने मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को जांच समिति गठित कर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, खाली भूमि (आवासीय घरों को छोड़कर) को वन विभाग के कब्जे में लेने और कोई नया निर्माण न करने के आदेश दिए गए हैं। इस आदेश के बाद ऋषिकेश में विरोध प्रदर्शन हुए, जिसमें स्थानीय निवासियों ने हाइवे और रेलवे ट्रैक ब्लॉक किए तथा अधिकारियों पर पत्थरबाजी की घटनाएं भी सामने आईं।



उन्होंने लिखा कि यह भूमि 1950 के आसपास गांधीजी की शिष्या मीरा बेन को पशु संवर्धन के लिए लीज पर दी गई थी, जिस पर बाद में एम्स, आईडीपीएल जैसे सरकारी संस्थान बने और टिहरी विस्थापितों का पुनर्वास हुआ। अब वन विभाग की कार्रवाई से दशकों से रह रहे लोगों में तनाव है।
उन्होंने प्रदेश भर के अन्य मामलों का भी उल्लेख किया, जैसे रामनगर के मालधन चाड़ के 31 वन ग्राम, गौलापार का बागजाला, हल्द्वानी का दमुवाढुंगा, नैनीताल का बिंदुखत्ता (जिसकी राजस्व गांव बनाने की सिफारिश 2024 में हो चुकी है लेकिन लागू नहीं हुई), तथा मद्महेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ जैसे तीर्थ क्षेत्रों के हक-हकूकधारियों को कब्जेदार मानकर नोटिस दिए जाना। पिंडर घाटी और पैठाणी के गांवों में भी इसी तरह के नोटिस जारी हुए हैं।
पत्र में वनाधिकार अधिनियम 2006 का हवाला देते हुए कहा गया है कि कई राज्यों ने इसका उपयोग कर लाखों लोगों को अधिकार दिए, लेकिन उत्तराखंड में इसका न्यूनतम प्रयोग हुआ। राज्य सरकार ने कभी अदालतों में इन मुद्दों को नहीं उठाया। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से एकतरफा कार्रवाई से प्रदेश में अशांति फैल सकती है।
आग्रह किया गया है कि वन भूमि पर पीढ़ियों से रह रहे लोगों के अधिकारों, उनकी विवशताओं और कानूनी समाधान पर चर्चा के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाए, क्योंकि यह मामला न्यायालयों से ज्यादा विधानसभा का है और राज्य का कर्तव्य है कि अपने निवासियों को उजड़ने से बचाए।